Tuesday, May 08, 2007

चन्द दोहे

पिछले कई दिनों से मै जगजीत सिंह जी की गायी इस नज्म को कई बार सुन चुका हूं लेकिन इस मे कुछ तो है जो मुझे बार -२ सुनने को प्रेरित करती है , हां , शायद इन दोहों के बोल ही हैं जो जिंदंगी की वास्तविकता को करीब से देखने की प्रेरणा देते हैं. आज जब रहा न गया तो इन दोहों को lifelogger.com पर अपलोड कर दिया . सुनने के लिये नीचे mp3 प्लेऐर पर चटका लगायें.



मै रोया परदेस मे भीगा माँ का प्यार ।
दु:ख मे दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार ॥
छोटा कर के देखिये जीवन का विस्तार ।
आँखो भर आकाश है बाँहों भर संसार ॥
ले के तन के नाप को घूमें बस्ती गाँव ।
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव ॥
सब की पूजा एक सी अलग- 2 हर रीति ।
मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीत ॥
पूज़ा घर मे मूर्ति मीरा के संग शयाम ।
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम ॥
नदिया सींचें खेत को तोता कुतरे आम ।
सूरज ढेकेदार सा सबको बाँटे काम ॥
साँतों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर ।
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर ॥
अच्छी संगत बैठ कर संगी बदले रूप ।
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गयी धूप ॥
सपना झरना नींद का जाकी आँखीं प्यास ।
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास ॥
चाहिये गीता बाँचिये या पढिये कुरान ।
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान ॥

5 comments:

Udan Tashtari said...

वाह भई डॉक्टर साः, बहुत दिन बाद दिखे और हमारे पसंद के दोहों के साथ. बहुत बढ़िया. पढ़ भी लिया और सुन भी लिया.

Anonymous said...

डॉक्टर साः बहुत बढिया दोहे है।

sunita (shanoo) said...

शुक्रिया प्रभात जी बहुत अच्छी नज्म लगी,..
सुनीता(शानू)

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

एक बार क्या अनेक बार सुन सुन कर भी मन नही भरे ऐसे दोहे हैं ये.
निदा फाज़ली जी ने क्या खूब लिखा है.
हम तक एक बार फिर पहुंचाने के लिये धन्यवाद.
अरविन्द चतुर्वेदी
भारतीयम्

prabhakar said...

बहुत सही सर, सुन डाली मैंने और दोहे भी चुरा डाले

साथ ही दीवाली की शुभकामनायें!!!